Monday, September 29, 2014
Sunday, June 8, 2014
शौचालय जरूरी है।
शौचालय जरूरी है।
देवालयों से पहले शौचालय जरूरी है। चीन में एक शहर है लिनफेन। यहाँ शौचालय जैसे मूलभूत जनसुविधाओं की बहुत भारी कमी थी। बड़े प्राजेक्टो की योजनाएं तो बनती थी परन्तु सार्वजनिक शौचालय बनवाने की तरफ किसी का ध्यान नही जाता था। काफी वर्षों तक लिनफेन दुनिया की सबसे गंदी जगहों में एक थी जहाँ रहना किसी नरक से कम नहीं था। 2008 में वहां के लोगो ने ‘‘शौचालय क्रांति’’ की शुरूआत की। पूरे विश्व का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ और लिनफेन की व्यवस्था में सुधार आना शुरू हो गया।इस शहर में जादुई परिवर्तन आया। एक समय में 6,00,000 आबादी के लिए केवल 12 शौचालय थे। नारकीय स्थिति से उभरने के लिए स्थानीय सरकार ने इस शहर के आसपास और जिन जगहों पर बहुत जरूरत थी, 200 नए शौचालय बनाए गए और जिन शौचालयों की स्थिति शौचनीय थी, उनका नए ढंग से पुर्ननिर्माण किया गया। शौचालयों में पूरी सुविधाओं के साथ सुन्दर सज़ावटी होने के कारण लोगो का दृष्टिकोण भी बदला। वे भी अब साफ सुथरा रहना चाहते थे। आज वहां प्रति वर्ष 20 करोड़ लोग शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं। लिनफेन और भारत के कुछ शहरों का मुकाबला किया जाए तो हम पाएंगे कि स्थिति बहुत ही गंभीर व शौचनीय है। अच्छे सुन्दर शौचालय के मामले में हम बहुत ही पिछड़े हुए हैं और कभी भी किसी सरकारी अधिकारी व नेता ने इस ओर ध्यान नहीं दिया । देश की बड़ी योजनाओं पर करोड़ो रूपये खर्च किए जाते है, जो जरूरी भी है, परन्तु शौचालय जैसे मूलभूत सार्वजनिक सुविधाओं की ओर कभी किसी सरकार या चुने हुए जन प्रतिनिधियांे का ध्यान नहीं जाता। चैन्नई जहां 6000 जन सुविधाएं चाहिए वहां केवल 714 और नागपुर जहां 3000 शौचालय चाहिए, वहां केवल 318 है। ऐसी स्थिति लगभग सभी शहरों में है। वर्तमान में जो शौचालय हैं भी उनका रखरखाव इतना खराब है कि चाह कर भी, प्रयोग करने की हिम्मत नहीं पड़ती। इस लगातार उपेक्षा के कारण स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं बढ़ी है।करोड़ो शहरी निवासियों को शौचालय की सुविधा देना एक बड़ी चुनौती और प्राथमिकता है। नगरों में ऐसी सुविधाओं को देना भी अपेक्षित है और उन सभी लोगों के लिए जो इन सुविधाओं का प्रयोग करते है।‘सुलभ इंटरनेशनल’ जैसी संस्थाओं ने इस क्षेत्र में काफी सराहनीय, कम कीमत व आसानी से रखरखाव के क्षेत्र में अच्छा काम किया है पर वे केवल वहां बनाए हैं जहां इनकी कमी है और घरेलू शौचालयों के लिए कुछ काम किया है। जरूरत है सार्वजनिक शौचालयों की संख्या बढ़ाना और उनके रखरखाव को सुधारना। यह मूलभूत सुविधाओं का ही एक हिस्सा है जिसकी जरूरत किसी भी सभ्य देश, शहर, मुहल्ले में हैं और इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती । आज के शौचालयों को इस तरह से सुन्दर व सुविधाजनक बनाया जाए। जिसे प्रयोग करने वाले गौरव महसूस करें, न कि इन शौचालयों में जाने से नफरत आए। दिल्ली की कुछ पुर्ननिवास कालोनियों में जाने का अवसर मिला; देखा कि बहुत ही कम लोगो के घरों में शौचालय हैं और सार्वजनिक शौचालयों पर प्रातः लोगो को घंटो लाइन में खड़ा होना पड़ता है । आप अनुमान लगा सकते हैं कि लोगो को कैसी मनःस्थिति से गुजरना पड़ता है।इन शौचालयों को इस तरह से बनाया जाए कि आसानी से इनकी फिटिंग की चोरी न हो सके, उनकी पूरी तरह से सुरक्षा की जानी चाहिए। इनका सौदंर्यकरण सुन्दर रंगो से किया जाना चाहिए और चाहिए उचित स्थान, अच्छा रखरखाव और संसधानों को पुनःप्रयोग ;त्मबलबसमद्ध करने की सुविधा हो। कोई भी स्थान, शहर वहां के सुन्दर शौचालयों के कारण अच्छी तरह जाना जाता है। ऐसे स्थानों पर महिलाओं के लिए बहुत सारे शौचालयों की जरूरत और विक्लांगो की जरूरत को भी समाहित किया जाना चाहिए। कानूनी तौर पर निर्देश होना चाहिए कि सभी स्थानीय सरकारी विभागों की इमारतो में, जो सड़क के किनारें हैं, जन सुविधाओं के लिए स्थान निर्धारित किया जाना चाहिए। इंग्लैंड में प्राईवेट संस्थानों को धन दिया जाता है ताकि लोगो की सुविधा के लिए शौचालयों को चलाए। किसी भी शहर का स्वास्थय का सीधा सम्बन्ध अच्छे सुविधापूर्वक शौचालयों से है और यह महत्वपूर्ण है। बड़ी संख्या में शौचालय बनाने की जरूरत है।जब कभी आर. डब्ल्यू. ए. ;त्ॅ।द्ध या फैडरेशन अपने जन प्रतिनिधि -निगम पार्षद, विधायक आदि का ध्यान इस ओर दिलाते हैं तो ये कहकर टाल दिया जाता है कि कहां बनाएं, और जब बन जाएंगे तो उसका रखरखाव न होने पर लोग ही उन्हें हटाने के लिए कहेंगे। समझ नही आता कि शौचालयों का रखरखाव क्यों नहीं हो सकता? पिछले वर्ष मुझे ताईवान और जापान जाने का अवसर प्राप्त हुआ । हम लोग वहां टोरोको नेशनल पार्क, जो 10,000 फुट की ऊँचाई पर था, देखने गए। आप अनुमान नहीं लगा सकते कि इतनी ऊँचाई पर सार्वजनिक शौचालयों का कैसे रखरखाव हो रहा है। 24 घंटे पानी है, टाॅयलेट पेपर उपलब्ध है और बदबू का नाम निशान नहीं। वहां की सरकार कैसे यह सब कर पाती है। यह प्रश्न है प्रबन्धन का। हमारें यहां सार्वजनिक शौचालयों का प्रबन्धन क्यों नहीं सकता? माना जनसंख्या बेशुमार है पर साधनों की कमी तो नहीं है, जरूरत है केवल इच्छा शक्ति की।हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने अपने एक भाषण में कहा था ‘देवालयों से पहले शौचालयों का निर्माण किया जाना चाहिए, जो सभी के लिए बहुत जरूरी है। अब आशा की जानी चाहिए कि इस दिशा में कोई कदम उठाए जाएंगे। यह राष्ट्रीय प्राथमिकता है और यहां भी ‘‘शौचालय क्रांति’’ लाने की जरूरत है। प्रस्तुति: लाजपत राय सभरवाल
माँ के आठ झूठ
माँ के आठ झूठएक बेटे की आत्मकथा के कुछ अंषः1) मेरा जन्म एक गरीब परिवार में हुआ। घर में खाने का अभाव ही रहता था। जब भी, जितना खाना माँ बनाती, अपने हिस्से का बहुत सा भाग मुझे दे देती थी। जब मेरी थाली में खाना परोस रही होती तो थोड़ा-थोड़ा खाना मेरी थाली में और डालती रहती और ले लो, मुझे भूख नहीं है। यह माँ का पहला झूठ था ।2) जैसे ही मैं व्यस्क हुआ, माँ अपने खाली समय में घर के पास ही नदी पर मछलियाँ पकड़ने चली जाती थी। माँ, मुझे पौष्टिक भोजन थोड़ा ज्यादा देना चाहती थी। जितनी भी मछलियाँ मिलती, वह चाहती थी कि मुझे ज्यादा दें। एक बार माँ ने दो ही मछलियाँ पकड़ी थी। माँ ने उन मछलियों का शोरबा बनाया । जब मैं शोरबा पी रहा था, माँ मेरे पास ही बैठी थी और बचा खुचा भोजन खा रही थी, मुझे बुरा लगा। मैं बहुत दुखी हुआ। मैनें माँ को भी शोरबा देना चाहा ताकि वह भी कभी कुछ पौष्टिक खा लिया करें। परन्तु माँ ने फौरन मना कर दिया, कहा ‘‘बेटा, मछली का शोरबा अच्छा नहीं लगता । यह माँ का दूसरा झूठ था ।3) उच्चा षिक्षा पर काफी खर्च होता है, इस खर्च को पूरा करने के लिए माँ माचिस की फैक्ट्री से इस्तेमाल की गई खाली डिब्बियां ला कर उनमें माचिस की तीलियां भरती थी। इससे थोड़ी सी आमदनी हो जाती थी और उससे घर का गुजारा चलता था। एक भयंकर सर्दी की रात जब मैं जागा तो देखा, माँ मोमबत्ती की रोषनी से माचिस की तीलियां भर रही थी। मैनंे कहा, माँ सो जाओ, रात बहुत हो चुकी है। बाकी काम कल कर लेना। माँ हंस कर बोली, तुम सो जाओ, मैं अभी थकी नहीं हूँ । यह माँ का तीसरा झूठ था ।जब मुझे अपनी फाइनल परीक्षा के लिए बैठना था, मेरी माँ साथ गई। सूयास्त होने पर भी मेरी माँ घंटो भीष्म गर्मी में प्रतीक्षा कर रही थी। जब घंटी बजी, मैं दौड़ कर माँ के पास गया। माँ ने मुझे छाती पर लगा कर प्यार किया और थरमॅस से नींबू पानी निकाल कर दिया। नींबू पानी से अधिक मेरे लिए माँ का वात्सल्य जरूरी था। माँ को पसीने में लथपथ देख कर, मैंने अपने गलास से नींबू पानी दिया ताकि वह भी कुछ प्यास बुझा ले। माँ ने कहा, ‘बेटा ! तुम पी लो, मुझे प्यास नहीं है। यह माँ का चैथा झूठ था ।5) मेरे पिता के स्वर्गवास होने के बाद माँ को एकल माता-पिता की भूमिका निभानी पड़ रही थी। जिस दफतर में माँ काम करती थी, वहीं काम जारी रखा क्यों कि उसके बिना हमारे घर का गुजारा नहीं हो सकता था। हमारे परिवार की व्यवस्था काफी पेचीदा थी। हमनें भूख के दिन भी देखे थे। हमारे परिवार के बिगड़ते हालात देख कर मेरे चाचा जो पास ही रहते थे, हमारी सहायता के हमें मिलने आए ताकि हमारी छोटी-बड़ी समस्याओं का समाधान कर सकें। हमारे पड़ोसी हमारी गरीबी की हालत से परिचित थे। उनमें से एक ने सलाह भी दी कि मेरी माँ दुबारा शादी कर लें। किन्तु मेरी माँ ने साफ इंकार कर दिया, यह कह कर कि उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं है। यह माँ का पांचवा झूठ था ।6) मेरी पढ़ाई खत्म होने के बाद मुझे अच्छी नौकरी मिल गई और यही उचित समय था कि मेरी मां काम से निवृत हो जाए परन्तु वह रोज़ बाज़ार जाती थी और एकसटरा काम करती । मैं उसे पैसे भेजता, लेकिन वह अटल रही, मुझे पैसे वापस भेज देती थी। वह कहती थी, मेरे पास काफी पैसे हैं। यह माँ का छटवा झूठ था।7) मैंने अपनी पार्ट टाइम स्नातोकतर की पढ़ाई जारी रखी। मैं एक अमरीकन कम्पनी के लिए काम करता था। उन्होनें मेरी पढ़ाई का खर्चा भी उठाया । मैं परीक्षा में सफल रहा । वेतन भी काफी मिलता था। मैनें फैसला किया कि माँ को अमरीका साथ ले जाऊं ताकि वह भी वहां आराम की जिंदगी जी सके। लेकिन मेरी माँ मुझे कष्ट नहीं देना चाहती थी । उसने कहा ‘‘मैं हाई सोसाइटी में नहीं रह सकती’’ । यह माँ का सातवां झूठ था। माँ मुझे बहुत प्यार करती थी। माँ को कंेसर हो गया और उसे अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया । मैं अब विदेष में थ, अपनी माँ को मिलने स्वदेष आया क्यों वह रोग पीडि़त थी और आॅपरेषन के बाद काफी कमजोर हो चुकी थी और चल फिर नहीं सकती थी। माँ मुस्काराने का प्रयास कर रही थी, परन्तु मैं बहुत उदास था। माँ ने कहा ‘‘बेटा, उदास मत हो, मुझे कोई पीड़ा नहीं है। यह माँ का आठवां झूठ था।हाँ, मेरी माँ सचमुच एक देवी का रूप था । जिस की माँ उस के साथ है, वह भाग्यषाली है। जिस की माँ नहीं है, वह उसकी यादों का सहारा लें, बीते पलों को याद करें। माँ के ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता । माता का हृदय एक स्नेहपूर्ण निर्झर है जो सृष्टि के आदि से अनवरत झरता हुआ मानवता का सिंचन कर है। इसी पृथ्वी पर देवी तत्व का एक मात्र प्रतीक मातृत्व है। उसके प्रति उच्चकोटि की श्रद्धा रखें बिना देवत्व की पूजा एवं साधना नहीं हो सकती। मातृरूपा नारी को हम बार-बार नमन करते हैं। मनुष्य जीवन की सभी संभावनाओं के मूल में माँ का असीम प्यार, उसका त्याग, उसकी महान सेवाएं ही निहित है। लाजपत राय सभरवाल
Saturday, June 7, 2014
शनि के रत्न और उपरत्न
शनिदेवता : वैदूर्य कांति रमल:,प्रजानां वाणातसी कुसुम वर्ण विभश्च शरत: . अन्यापि वर्ण भुव गच्छति तत्सवर्णाभि सूर्यात्मज: अव्यतीति मुनि प्रवाद: भावार्थ:-शनि ग्रह वैदूर्यरत्न अथवा बाणफ़ूल या अलसी के फ़ूल जैसे निर्मल रंग से जब प्रकाशित होता है,तो उस समय प्रजा के लिये शुभ फ़ल देता है यह अन्य वर्णों को प्रकाश देता है,तो उच्च वर्णों को समाप्त करता है,ऐसा ऋषि महात्मा कहते हैं. शनि ग्रह के प्रति अनेक आखयान पुराणों में प्राप्त होते हैं.शनि को सूर्य पुत्र माना जाता है.लेकिन साथ ही पितृ शत्रु भी.शनि ग्रह के सम्बन्ध मे अनेक भ्रान्तियां और इस लिये उसे मारक,अशुभ और दुख कारक माना जाता है.पाश्चात्य ज्योतिषी भी उसे दुख देने वाला मानते हैं.लेकिन शनि उतना अशुभ और मारक नही है,जितना उसे माना जाता है.इसलिये वह शत्रु नही मित्र है.मोक्ष को देने वाला एक मात्र शनि ग्रह ही है.सत्य तो यह ही है कि शनि प्रकृति में संतुलन पैदा करता है,और हर प्राणी के साथ न्याय करता है.जो लोग अनुचित विषमता और अस्वाभाविक समता को आश्रय देते हैं,शनि केवल उन्ही को प्रताडित करता है.
पौराणिक संदर्भ: शनि के सम्बन्ध मे हमे पुराणों में अनेक आख्यान मिलते हैं.माता के छल के कारण पिताने उसे शाप दिया.पिता अर्थात सूर्य ने कहा,"तू क्रूरतापूर्ण द्रिष्टि देखने वाला मंदगामी ग्रह हो जाये".यह भी आख्यान मिलता है कि शनि के प्रकोप से ही अपने राज्य को घोर दुर्भिक्ष से बचाने के लिये राजा दसरथ उनसे मुकाबला करने पहुंचे तो उनका पुरुषार्थ देख कर शनि ने उनसे वरदान मांगने के लिये कहा.राजा दसरथ ने विधिवत स्तुति कर उसे प्रसन्न किया.पद्म पुराण में इस प्रसंग का सविस्तार वर्णन है.ब्रह्मवैवर्त पुराण में शनि ने जगत जननी पार्वती को बताया है कि मैं सौ जन्मो तक जातक की करनी का फ़ल भुगतान करता हूँ.एक बार जब विष्णुप्रिया लक्ष्मी ने शनि से पूंछा कि तुम क्यों जातकों को धन हानि करते हो,क्यों सभी तुम्हारे प्रभाव से प्रताडित रहते हैं,तो शनि महाराज ने उत्तर दिया,"मातेश्वरी,उसमे मेरा कोई दोष नही है,परमपिता परमात्मा ने मुझे तीनो लोकों का न्यायाधीश नियुक्त किया हुआ है,इसलिये जो भी तीनो लोकों के अंदर अन्याय करता है,उसे दंड देना मेरा काम है".एक आख्यान और मिलता है,कि किस प्रकार से ऋषि अगस्त ने जब शनि देव से प्रार्थना की थी,तो उन्होने राक्षसों से उनको मुक्ति दिलवाई थी.जिस किसी ने भी अन्याय किया,उनको ही उन्होने दंड दिया,चाहे वह भगवान शिव की अर्धांगिनी सती रही हों,जिन्होने सीता का रूप रखने के बाद बाबा भोले नाथ से झूठ बोलकर अपनी सफ़ाई दी और परिणाम में उनको अपने ही पिता की यज्ञ में हवन कुंड मे जल कर मरने के लिये शनि देव ने विवश कर दिया,अथवा राजा हरिश्चन्द्र रहे हों,जिनके दान देने के अभिमान के कारण सप्तनीक बाजार मे बिकना पडा और,शमशान की रखवाली तक करनी पडी,या राजा नल और दमयन्ती को ही ले लीजिये,जिनके तुच्छ पापों की सजा के लिये उन्हे दर दर का होकर भटकना पडा,और भूनी हुई मछलियां तक पानी मै तैर कर भाग गईं,फ़िर साधारण मनुष्य के द्वारा जो भी मनसा,वाचा,कर्मणा,पाप कर दिया जाता है वह चाहे जाने मे किया जाय या अन्जाने में,उसे भुगतना तो पडेगा ही. मत्स्य पुराण में महात्मा शनि देव का शरीर इन्द्र कांति की नीलमणि जैसी है,वे गिद्ध पर सवार है,हाथ मे धनुष बाण है एक हाथ से वर मुद्रा भी है,शनि देव का विकराल रूप भयावना भी है.शनि पापियों के लिये हमेशा ही संहारक हैं. पश्चिम के साहित्य मे भी अनेक आख्यान मिलते हैं,शनि देव के अनेक मन्दिर हैं,भारत में भी शनि देव के अनेक मन्दिर हैं,जैसे शिंगणापुर ,वृंदावन के कोकिला वन,ग्वालियर के शनिश्चराजी,दिल्ली तथा अनेक शहरों मे महाराज शनि के मन्दिर हैं.
असली रत्नों को मात करते कुछ उपरत्न
अक्सर लोग कुच रत्नो को उपरत्न समझ कर पहन लेते हैं | लोगों को पता ही नहीं होता कि उपरत्न और असली रत्न में क्या फर्क है | माणिक मोती मूंगा आदि की तरह ही कुछ ऐसे रत्न हैं जिनका अपना अलग स्वभाव होता है | यह भी रत्न हैं जो अन्य रत्नों की तरह उत्पन्न होते हैं | इन्हें उपरत्न की संज्ञा नहीं दी जानी चाहिए |
मुझे बचपन से ही रत्न पहनने का शौक था | मैंने लगभग हर रत्न को आजमा कर देखा है | बंगाल के एक बाबा ने मुझे उपरत्नों के बारे में काफी जानकारी दी थी | फिर मैंने उस ज्ञान पर इन रत्नों को परख कर देखा तो जो सत्य मैंने पाया किया वह इस प्रकार है |
फिरोजा
फिरोजा एक सस्ता रत्न है | आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला फिरोजा नीला और हरा मिश्रित रंग का होता है | इस रत्न को सजावट के लिए अधिक पहना जाता है | अधिकतर लोग केवल इतना ही जानते हैं परन्तु इस उपरत्न विशेषता है कि यह दो ग्रहों के शुभ प्रभाव को बढाता है | अन्य कोई ऐसा रत्न नहीं है जो दो ग्रहों को शांत करता हो शनि और बुध मिलकर व्यक्ति को नपुंसक बनाते हैं और फिरोजा नपुंसकता को नष्ट करता है | जुए और सट्टे की लत से छुटकारा दिलाता है, शराब छुडवाने के लिए भी फिरोजा पहना जा सकता है | इसे पहनने से व्यक्ति कूटनीति में सफलता प्राप्त कर सकता है | हर किसी को यह रत्न लाभ नहीं देता परन्तु जिस किसी को यह रत्न माफिक आ जाए उसका हर शत्रु से बचाव करता है |
काला जादू या तांत्रिक क्रियाकलाप में फिरोजा बहुत काम आता है | यदि फिरोजा पहना है तो भूत प्रेत और बुरी नजर से बचाव करता है | इसके अतिरिक्त फिरोजा ग्रह स्थिति के अनुसार अपना प्रभाव दिखाता है | बहुत कम लोग जानते हैं कि उत्तम फिरोजा केवल रंग से पहचाना जा सकता है | लोग फिरोजी रंग के हकीक के नीचे लाख लगाकर भी बेचते देखे गए हैं | फिरोजा यदि असली मिल जाए तो लाख तो उसके नीचे होगी ही परन्तु इसका रंग और आभा देखकर आप मन्त्र मुग्ध हो जायेंगे | बेहद आकर्षक यह रत्न जितना सुन्दर लगता है उतना ही यह प्रभाव भी देता है |
फिरोजा एक सस्ता रत्न है | आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला फिरोजा नीला और हरा मिश्रित रंग का होता है | इस रत्न को सजावट के लिए अधिक पहना जाता है | अधिकतर लोग केवल इतना ही जानते हैं परन्तु इस उपरत्न विशेषता है कि यह दो ग्रहों के शुभ प्रभाव को बढाता है | अन्य कोई ऐसा रत्न नहीं है जो दो ग्रहों को शांत करता हो शनि और बुध मिलकर व्यक्ति को नपुंसक बनाते हैं और फिरोजा नपुंसकता को नष्ट करता है | जुए और सट्टे की लत से छुटकारा दिलाता है, शराब छुडवाने के लिए भी फिरोजा पहना जा सकता है | इसे पहनने से व्यक्ति कूटनीति में सफलता प्राप्त कर सकता है | हर किसी को यह रत्न लाभ नहीं देता परन्तु जिस किसी को यह रत्न माफिक आ जाए उसका हर शत्रु से बचाव करता है |
काला जादू या तांत्रिक क्रियाकलाप में फिरोजा बहुत काम आता है | यदि फिरोजा पहना है तो भूत प्रेत और बुरी नजर से बचाव करता है | इसके अतिरिक्त फिरोजा ग्रह स्थिति के अनुसार अपना प्रभाव दिखाता है | बहुत कम लोग जानते हैं कि उत्तम फिरोजा केवल रंग से पहचाना जा सकता है | लोग फिरोजी रंग के हकीक के नीचे लाख लगाकर भी बेचते देखे गए हैं | फिरोजा यदि असली मिल जाए तो लाख तो उसके नीचे होगी ही परन्तु इसका रंग और आभा देखकर आप मन्त्र मुग्ध हो जायेंगे | बेहद आकर्षक यह रत्न जितना सुन्दर लगता है उतना ही यह प्रभाव भी देता है |
हकीक
हकीक एक बहुत ही सस्ता और शीघ्र असर दिखाने वाला रत्न है | इसे एक बार पहन लेने के बाद आपको गुस्सा नहीं आएगा | हकीक के बारे में कहा जाता है कि इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता परन्तु यह सच नहीं है | 95% लोगों के लिए यह रत्न शुभ होता है बाकी के लोग इसे पहनने से बेचैनी, घबराहट, चिंता और डर का अनुभव करेंगे |
हकीक लगभग सभी रंगों में आता है | लाल रंग का हकीक उत्तम माना जाता है | यह रत्न जितना छोटा होगा उतना ही इसका प्रभाव अधिक होगा और जितना बड़ा होगा उतना कम प्रभाव देगा |
सफेद रंग का हकीक शुक्र का, लाल रंग का हकीक मंगल का, भूरे रंग का हकीक सूर्य का, पीला हकीक गुरु यानी बृहस्पति का, और काला हकीक राहू का प्रभाव देता है | मिश्रित रंगों के हकीक भी पाए जाते हैं जो रंगों के अनुसार अपना प्रभाव दिखाते हैं | हकीक से आपके व्यक्तित्व का विकास होता है | जल्दबाजी की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखने में सहायक है | मुसीबत से बचाता है और मित्रों को आकर्षित करने में भी सहायक सिद्ध होता है |
रहस्य की बात ये है कि हकीक से आध्यात्मिक क्षेत्र में मदद करता है | यदि आपका पूजा पाठ और धार्मिक
क्रियाकलाप में मन नहीं लगता है तो हकीक आप ही के लिए है |
हकीक एक बहुत ही सस्ता और शीघ्र असर दिखाने वाला रत्न है | इसे एक बार पहन लेने के बाद आपको गुस्सा नहीं आएगा | हकीक के बारे में कहा जाता है कि इसका कोई साइड इफेक्ट नहीं होता परन्तु यह सच नहीं है | 95% लोगों के लिए यह रत्न शुभ होता है बाकी के लोग इसे पहनने से बेचैनी, घबराहट, चिंता और डर का अनुभव करेंगे |
हकीक लगभग सभी रंगों में आता है | लाल रंग का हकीक उत्तम माना जाता है | यह रत्न जितना छोटा होगा उतना ही इसका प्रभाव अधिक होगा और जितना बड़ा होगा उतना कम प्रभाव देगा |
सफेद रंग का हकीक शुक्र का, लाल रंग का हकीक मंगल का, भूरे रंग का हकीक सूर्य का, पीला हकीक गुरु यानी बृहस्पति का, और काला हकीक राहू का प्रभाव देता है | मिश्रित रंगों के हकीक भी पाए जाते हैं जो रंगों के अनुसार अपना प्रभाव दिखाते हैं | हकीक से आपके व्यक्तित्व का विकास होता है | जल्दबाजी की प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखने में सहायक है | मुसीबत से बचाता है और मित्रों को आकर्षित करने में भी सहायक सिद्ध होता है |
रहस्य की बात ये है कि हकीक से आध्यात्मिक क्षेत्र में मदद करता है | यदि आपका पूजा पाठ और धार्मिक
क्रियाकलाप में मन नहीं लगता है तो हकीक आप ही के लिए है |
सफेद मूंगा
सफेद मूंगा एक बहुत ही चमत्कारी रत्न है | बनावट में यह लाल मूंगे जैसा ही होता है परन्तु इसका रंग सफेद होता है | सफेद मूंगा शुक्र का रत्न है | केप्सूल आकार का मूंगा अधिक लोकप्रिय है | उपरत्नों में मैंने स्वयं इसका प्रभाव देखा है | शुक्र के दुष्प्रभाव को ज्यादा नहीं तो कम से कम ६० प्रतिशत तक कम कर देता है | हर जगह एक ही बात पढने सुनने में मिलती है कि जितने वजन का रत्न होगा उतना ही लाभकारी होगा परन्तु सुनी सुनाई बातों पर विशवास करने की बजाय खुद परख कर देखना चाहिए कि चीजें कैसे काम करती हैं | जो रत्न पहना जा रहा है उसका वजन उतना ही होना चाहिए जितने बल या शक्ति की आपकी जन्मकुंडली में बैठे ग्रह को आवश्यकता है | यदि शुक्र नीच राशि में है तब तो सफेद मूंगा पहनिए ही मत | शुक्र का असली रत्न हीरा ही आपके शुक्र के प्रभाव को कुछ शांत कर सकता है | उपरत्न या तो टूट जायेगा या किसी और वजह से आपकी ऊँगली से निकल जायेगा | सफेद मूंगा तब पहनें जब आपकी कुंडली में शुक्र अस्त या मंगल, शनि राहू से युत {Conjunction} या दृष्ट है |
इसके अतिरिक्त जिन लोगों को शुगर हो उनके लिए सफेद मूंगा बहुत लाभप्रद सिद्ध होता है | शुक्र के कारण व्यक्ति को शुगर का रोग लगता है | यदि सफेद मूंगा पहन लिया जाए तो शुगर कंट्रोल में रहती है |
सफेद मूंगा एक बहुत ही चमत्कारी रत्न है | बनावट में यह लाल मूंगे जैसा ही होता है परन्तु इसका रंग सफेद होता है | सफेद मूंगा शुक्र का रत्न है | केप्सूल आकार का मूंगा अधिक लोकप्रिय है | उपरत्नों में मैंने स्वयं इसका प्रभाव देखा है | शुक्र के दुष्प्रभाव को ज्यादा नहीं तो कम से कम ६० प्रतिशत तक कम कर देता है | हर जगह एक ही बात पढने सुनने में मिलती है कि जितने वजन का रत्न होगा उतना ही लाभकारी होगा परन्तु सुनी सुनाई बातों पर विशवास करने की बजाय खुद परख कर देखना चाहिए कि चीजें कैसे काम करती हैं | जो रत्न पहना जा रहा है उसका वजन उतना ही होना चाहिए जितने बल या शक्ति की आपकी जन्मकुंडली में बैठे ग्रह को आवश्यकता है | यदि शुक्र नीच राशि में है तब तो सफेद मूंगा पहनिए ही मत | शुक्र का असली रत्न हीरा ही आपके शुक्र के प्रभाव को कुछ शांत कर सकता है | उपरत्न या तो टूट जायेगा या किसी और वजह से आपकी ऊँगली से निकल जायेगा | सफेद मूंगा तब पहनें जब आपकी कुंडली में शुक्र अस्त या मंगल, शनि राहू से युत {Conjunction} या दृष्ट है |
इसके अतिरिक्त जिन लोगों को शुगर हो उनके लिए सफेद मूंगा बहुत लाभप्रद सिद्ध होता है | शुक्र के कारण व्यक्ति को शुगर का रोग लगता है | यदि सफेद मूंगा पहन लिया जाए तो शुगर कंट्रोल में रहती है |
Saturday, May 10, 2014
हनुमान चालीसा लॉकेट
मै हनुमान चालीसा का होल्ड सेलर हु आप हनुमान चालीसा मंगबाने के लिए संपर्क करें !
rohitkiidz@hotmail.com
http://hanumanchalisayantra.com/
rohit sharma
Tushar Sharma
Thursday, May 8, 2014
चाणक्य
चाणक्य
| चाणक्य | |
|---|---|
चाणक्य का कल्पित चित्र | |
| जन्म | अनुमानतः ईसापूर्व ३७५ पंजाब |
| मृत्यु | अनुमानतः ईसापूर्व २२५ पाटलिपुत्र |
| निवास | पाटलिपुत्र |
| अन्य नाम | कौटिल्य, विष्णुगुप्त |
| अल्मा मेटर | तक्षशिला |
| व्यवसाय | चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री |
| उल्लेखनीय काम | अर्थशास्त्र (कई विद्वानों के बीच मतभेद पाया जाता है), चाणक्यनीति |
चाणक्य (अनुमानतः ईसापूर्व ३७५ - ईसापूर्व २२५) चन्द्रगुप्त मौर्य के महामंत्री थे। वे 'कौटिल्य' नाम से भी विख्यात हैं। उन्होने नंदवंश का नाश करके चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा बनाया। उनके द्वारा रचित अर्थशास्त्र राजनीति, अर्थनीति, कृषि, समाजनीति आदि का महान ग्रंन्थ है। अर्थशास्त्र मौर्यकालीन भारतीय समाज का दर्पण माना जाता है।
मुद्राराक्षस के अनुसार इनका असली नाम 'विष्णुगुप्त' था। विष्णुपुराण, भागवत आदि पुराणों तथा कथासरित्सागर आदि संस्कृत ग्रंथों में तो चाणक्य का नाम आया ही है, बौद्ध ग्रंथो में भी इसकी कथा बराबर मिलती है । बुद्धघोष की बनाई हुई विनयपिटक की टीका तथा महानाम स्थविर रचित महावंश की टीका में चाणक्य का वृत्तांत दिया हुआ है । चाणक्य तक्षशिला (एक नगर जो रावलापिंडी के पास था) के निवासी थे । इनके जीवन की घटनाओं का विशेष संबंध मौर्य चंद्रगुप्त की राज्यप्राप्ति से है । ये उस समय के एक प्रसिद्ध विद्वान थे, इसमें कोई संदेह नहीं। कहते हैं कि चाणक्य राजसी ठाट-बाट से दूर एक छोटी सी कुटिया में रहते थे।
उनके नाम पर एक धारावाहिक भा बना था जो दूरदर्शन पर १९९० के दशक में दिखाया जाता था ।
परिचय[संपादित करें]
चद्रगुप्त के साथ चाणक्य की मैत्री की कथा इस प्रकार है-
पाटलिपुत्र के राजा नंद या महानंद के यहाँ कोई यज्ञ था । उसमें ये भी गए और भोजन के समय एक प्रधान आसन पर जा बैठे । महाराज नंद ने इनका काला रंग देख इन्हें आसन पर से उठवा दिया । इसपर क्रुद्ध होकर इन्होंने यह प्रतिज्ञा की कि जबतक मैं नंदों का नाश न कर लूँगा तबतक अपनी शिखा न बाँधूँगा । उन्हीं दिनों राजकुमार चंद्रगुप्त राज्य से निकाले गए थे । चद्रगुप्त ने चाणक्य से मेल किया और दोनों आदमियों ने मिलकर म्लेच्छ राजा पर्वतक की सेना लेकर पटने पर चढ़ाई की और नंदों को युद्ध में परास्त करके मार डाला ।
नंदों के नाश के संबंध में कई प्रकार की कथाएँ हैं । कहीं लिखा है कि चाणक्य ने शकटार के यहाँ निर्माल्य भेजा जिसे छूते ही महानंद और उसके पुत्र मर गए । कहीं विषकन्या भेजने की कथा लिखी है । मुद्राराक्षस नाटक के देखेने से जाना जाता है कि नंदों का नाश करने पर भी महानंद के मंत्री राक्षस के कौशल और नीति के कारण चंद्रगुप्त को मगध का सिंहासन प्राप्त करने में बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ पडीं । अंत में चाणक्य ने अपने नीतिबल से राक्षस को प्रसन्न किया और चंद्रगुप्त को मंत्री बनाया । बौद्ध ग्रंथो में भी इसी प्रकार की कथा है, केवल 'महानंद' के स्थान पर 'धननंद' है।
जीवन-चरित[संपादित करें]
यद्यपि कौटिल्य के जीवन के संबंध में प्रामाणिक तथ्यों का अभाव है। उनके जन्मस्थान के संबंध में भी मतभेद पाया जाता है।
कुछ विद्वानों के अनुसार कौटिल्य का जन्म पंजाब के 'चणक' क्षेत्र में हुआ था, जबकि कुछ विद्वान मानते हैं कि उसका जन्म दक्षिण भारत में हुआ था। कई विद्वानों का यह मत है कि वह कांचीपुरम का रहने वाला द्रविण ब्राह्मण था। वह जीविकोपार्जन की खोज में उत्तर भारत आया था। कुछ विद्वानों के मतानुसार केरल भी उसका जन्म स्थान बताया जाता है। इस संबंध में उसके द्वारा चरणी नदी का उल्लेख इस बात के प्रमाण के रूप में दिया जाता है। कुछ संदर्भों में यह उल्लेख मिलता है कि केरल निवासी विष्णुगुप्त तीर्थाटन के लिए वाराणसी आया था, जहाँ उसकी पुत्री खो गयी। वह फिर केरल वापस नहीं लौटा और मगध में आकर बस गया। इस प्रकार के विचार रखने वाले विद्वान उसे केरल के कुतुल्लूर नामपुत्री वंश का वंशज मानते हैं। कई विद्वानों ने उसे मगध का ही मूल निवासी माना है। कुछ बौद्ध साहित्यों ने उसे तक्षशिक्षा का निवासी बताया है। कौटिल्य के जन्मस्थान के संबंध में अत्यधिक मतभेद रहने के कारण निश्चित रूप से यह कहना कि उसका जन्म स्थान कहाँ था, कठिन है, परंतु कई संदर्भों के आधार पर तक्षशिला को उसका जन्म स्थान मानना ठीक होगा।
वी. के. सुब्रमण्यम ने कहा है कि कई संदर्भों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सिकन्दर को अपने आक्रमण के अभियान में युवा कौटिल्य से भेंट हुई थी। चूँकि अलेक्जेंडर का आक्रमण अधिकतर तक्षशिला क्षेत्र में हुआ था, इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि कौटिल्य का जन्म स्थान तक्षशिला क्षेत्र में ही रहा होगा। कौटिल्य के पिता का नाम चणक था। वह एक गरीब ब्राह्मण था और किसी तरह अपना गुजर-बसर करता था। अतः स्पष्ट है कि कौटिल्य का बचपन गरीबी और दिक्कतों में गुजरा होगा। कौटिल्य की शिक्षा-दीक्षा के संबंध में कहीं कुछ विशेष जिक्र नहीं मिलता है, परन्तु उसकी बुद्धि का प्रखरता और उसकी विद्वता उसके विचारों से परिलक्षित होती है। वह कुरूप होते हुए भी शारीरिक रूप से बलिष्ठ था। उसकी पुस्तक 'अर्शशास्त्र' के अवलोकन से उसकी प्रतिभा, उसके बहुआयामी व्यक्तित्व और दूरदर्शिता का पूर्ण आभास होता है।
कौटिल्य के बारे में यह कहा जाता है कि वह बड़ा ही स्वाभिमानी एवं क्रोधी स्वभाव का व्यक्ति था। एक किंवदंती के अनुसार एक बार मगध के राजा महानंद ने श्राद्ध के अवसर पर कौटिल्य को अपमानित किया था। कौटिल्य ने क्रोध के वशीभूत होकर अपनी शिखा खोलकर यह प्रतिज्ञा की थी कि जब तक वह नंदवंश का नाश नहीं कर देगा तब तक वह अपनी शिखा नहीं बाँधेंगा। कौटिल्य के व्यावहारिक राजनीति में प्रवेश करने का यह भी एक बड़ा कारण था। नंदवंश के विनाश के बाद उसने चन्द्रगुप्त मौर्य को राजगद्दी पर बैठने में हर संभव सहायता की। चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा गद्दी पर आसीन होने के बाद उसे पराक्रमी बनाने और मौर्य साम्राज्य का विस्तार करने के उद्देश्य से उसने व्यावहारिक राजनीति में प्रवेश किया। वह चन्द्रगुप्त मौर्य का मंत्री भी बना।
कई विद्वानों ने यह कहा है कि कौटिल्य ने कहीं भी अपनी रचना में मौर्यवंश या अपने मंत्रित्व के संबंध में कुछ नहीं कहा है, परंतु अधिकांश स्रोतों ने इस तथ्य की संपुष्टि की है। 'अर्थशास्त्र' में कौटिल्य ने जिस विजिगीषु राजा का चित्रण प्रस्तुत किया है, निश्चित रूप से वह चन्द्रगुप्त मौर्य के लिये ही संबोधित किया गया है।
भारत पर सिकन्दर के आक्रमण के कारण छोटे-छोटे राज्यों की पराजय से अभिभूत होकर कौटिल्य ने व्यावहारिक राजनीति में प्रवेश करने का संकल्प किया। उसकी सर्वोपरि इच्छा थी भारत को एक गौरवशाली और विशाल राज्य के रूप में देखना। निश्चित रूप से चन्द्रगुप्त मौर्य उसकी इच्छा का केन्द्र बिन्दु था। आचार्य कौटिल्य को एक ओर पारंगत और दूरदर्शी राजनीतिज्ञ के रूप में मौर्य साम्राज्य का संस्थापक और संरक्षक माना जाता है, तो दूसरी ओर उसे संस्कृति साहित्य के इतिहास में अपनी अतुलनीय एवं अद्भुत कृति के कारण अपने विषय का एकमात्र विद्वान होने का गौरव प्राप्त है। कौटिल्य की विद्वता, निपुणता और दूरदर्शिता का बखान भारत के शास्त्रों, काव्यों तथा अन्य ग्रंथों में परिव्याप्त है। कौटिल्य द्वारा नंदवंश का विनाश और मौर्यवंश की स्थापना से संबंधित कथा विष्णु पुराण में आती है।
अति विद्वान और मौर्य साम्राज्य का महामंत्री होने के बावजूद कौटिल्य का जीवन सादगी का जीवन था। वह 'सादा जीवन उच्च विचार' का सही प्रतीक था। उसने अपने मंत्रित्वकाल में अत्यधिक सादगी का जीवन बिताया। वह एक छोटा-से मकान में रहता था और कहा जाता है कि उसके मकान की दीवारों पर गोबर के उपले थोपे रहते थे।
उसकी मान्यता थी कि राजा या मंत्री अपने चरित्र और ऊँचे आदर्शों के द्वारा लोगों के सामने एक प्रतिमान दे सकता है। उसने सदैव मर्यादाओं का पालन किया और कर्मठता की जिंदगी बितायी। कहा जाता है कि बाद में उसने मंत्री पद त्यागकर वानप्रस्थ जीवन व्यतीत किया था। वस्तुतः उसे धन, यश और पद का कोई लोभ नहीं था। सारतत्व में वह एक 'वितरागी', 'तपस्वी, कर्मठ और मर्यादाओं का पालन करनेवाला व्यक्ति था, जिसका जीवन आज भी अनुकरणीय है।
एक प्रकांड विद्वान तथा एक गंभीर चिंतक के रूप में कौटिल्य तो विख्यात है ही, एक व्यावहारिक एवं चतुर राजनीतिज्ञ के रूप में भी उसे ख्याति मिली है। नंदवंश के विनाश तथा मगध साम्राज्य की स्थापना एवं विस्तार में उसका ऐतिहासिक योगदान है। सालाटोर के कथनानुसार प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में कौटिल्य का सर्वोपरि स्थान है। मैकियावेली की भाँति कौटिल्य ने भी राजनीति को नैतिकता से पृथक कर एक स्वतंत्र शास्त्र के रूप में अध्ययन करने का प्रयास किया है। जैसा कि काहा जाता है कौटिल्य ने को
नाम, जन्मतिथि और जन्मस्थान[संपादित करें]
कौटिल्य का नाम, जन्मतिथि और जन्मस्थान तीनों ही विवाद के विषय रहे हैं। कौटिल्य के नाम के संबंध में विद्वानों के बीच मतभेद पाया जाता है। कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' के प्रथम अनुवादक पंडित शामाशास्त्री नेकौटिल्य नाम का प्रयोग किया है। 'कौटिल्य नाम' की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए पंडित शामाशास्त्री ने विष्णु-पुराण का हवाला दिया है जिसमें कहा गया है—
- तान्नदान् कौटल्यो ब्राह्मणस्समुद्धरिष्यति।
इस संबंध में एक विवाद और उत्पन्न हुआ है, और वह है कौटिल्य और कौटल्य का। गणपति शास्त्री ने 'कौटिल्य' के स्थान पर 'कौटल्य' को ज्यादा प्रमाणिक माना है। उनके अनुसार कुटल गोत्र होने के कारण कौटल्य नाम सही और संगत प्रतीत होता है। कामन्दकीय नीतिशास्त्र के अन्तर्गत कहा गया है—
- कौटल्य इति गोत्रनिबन्धना विष्णु गुप्तस्य संज्ञा।
सांबाशिव शास्त्री ने कहा है कि गणपतिशास्त्री ने संभवतः कौटिल्य को प्राचीन संत कुटल का वंशज मानकर कौटल्य नाम का प्रयोग किया है, परन्तु इस बात का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिलता है कि कौटिल्य संत कुटल के वंश और गोत्र का था। 'कोटिल्य' और 'कौटल्य' नाम का विवाद और भी कई विद्वानों ने उठाया है। वी. ए. रामास्वामी ने गणपतिशास्त्री के कथन का समर्थन किया है। आधुनिक विद्वानों ने दोनों नामों का प्रयोग किया है। पाश्चात्य विद्वानों ने कौटल्य और कौटिल्य नाम के विवाद को अधिक महत्त्व नहीं दिया है। उनके मतानुसार इस प्रकार की भ्रांति हिज्जे के हेर-फेर के कारण हो सकती है। अधिकांश पाश्चात्य लेखकों ने कौटिल्य नाम का ही प्रयोग किया है। भारत में विद्वानों ने दोनों नामों का प्रयोग किया है, बल्कि ज्यादातर कौटिल्य नाम का ही प्रयोग किया है। इस संबंध में राधाकांत का कथन भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उसने अपनी रचना 'शब्दकल्पद्रम' में कहा है
- अस्तु कौटल्य इति वा कौटिल्य इति या चाणक्यस्य गोत्रनामधेयम्।
कौटिल्य के और भी कई नामों का उल्लेख किया गया है। जिसमें चाणक्य नाम प्रसिद्ध है। कौटिल्य को चाणक्य के नाम से पुकाररने वाले कई विद्वानों का मत है कि चाणक का पुत्र होने के कारण यह चाणक्य कहलाया। दूसरी ओर कुछ विद्वानों के कथानानुसार उसका जन्म पंजाब के चणक क्षेत्र में हुआ था, इसलिए उसे चाणक्य कहा गया है, यद्यपि इस संबंध में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता है। एक बात स्पष्ट है कि कौटिल्य और चाणक्य एक ही व्यक्ति है।
उपर्युक्त नामों के अलावा उसके और भी कई नामों का उल्लेख मिलता है, जैसे विष्णुगुप्त। कहा जाता है कि उसका मूल नाम विष्णुगुप्त ही था। उसके पिता ने उसका नाम विष्णुगुप्त ही रखा था। कौटिल्य, चाणक्य और विष्णुगुप्त तीनों नामों से संबंधित कई संदर्भ मिलते हैं, किंतु इन तीनों नामों के अलावा उसके और भी कई नामों का उल्लेख किया गया है, जैसे वात्स्यायन, मलंग, द्रविमल, अंगुल, वारानक्, कात्यान इत्यादि इन भिन्न-भिन्न नामों में कौन सा सही नाम है और कौन-सा गलत नाम है, यह विवाद का विषय है। परन्तु अधिकांश पाश्चात्य और भारतीय विद्वानों ने 'अर्थशास्त्र' के लेखक के रूप में कौटिल्य नाम का ही प्रयोग किया है।
कुछ पाश्चात्य विद्वानों ने कौटिल्य के अस्तित्व पर ही प्रश्नवाचक चिह्न लगा दिया है। विन्टरनीज, जॉली और कीथ के मतानुसार कौटिल्य नाम प्रतीकात्मक है, जो कूटनीति का प्रतीक है। पांतजलि द्वारा अपने महाभाष्य में कौटिल्य का प्रसंग नहीं आने के कारण उनके मतों का समर्थन मिला है। जॉली ने तो यहाँ तक कह डाला है कि 'अर्थशास्त्र' किसी कौटिल्य नामक व्यक्ति की कृति नहीं है। यह किसी अन्य पंडित या आचार्य का रचित ग्रंथ है। शामाशास्त्री और गणपतिशास्त्री दोनों ने ही पाश्चात्य विचारकों के मत का खंडन किया है। दोनों का यह निश्चय मत है कि कौटिल्य का पूर्ण अस्तित्व था, भले ही उसके नामों में मतांतर पाया जाता हो। वस्तुतः इन तीनों पाश्चात्य विद्वानों के द्वारा कौटिल्य का अस्तित्व को नकारने के लिए जो बिंदु उठाए गए हैं, वे अनर्गल एवं महत्त्वहीन हैं। पाश्चात्य विद्वानों का यह कहना है कि कौटिल्य ने इस बात का कहीं उल्लेख नहीं किया है कि वह चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में अमात्य या मंत्री था, इसलिए उस 'अर्थशास्त्र' का लेखन नहीं माना जा सकता है। यह बचकाना तर्क है। कौटिल्य के कई संदर्भों से यह स्पष्ट हो चुका है कि उसने चन्द्रगुप्त मौर्य की सहायता से नंदवंश का नाश किया था और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की थी।
कौटिल्य की कृतियाँ[संपादित करें]
कौटिल्य की कृतियों के संबंध में भी कई विद्वानों के बीच मतभेद पाया जाता है। कौटिल्य की कितनी कृतियाँ हैं, इस संबंध में कोई निश्चित सूचना उपलब्ध नहीं है। कौटिल्य की सबसे महत्त्पूर्ण कृति अर्थशास्त्र की चर्चा सर्वत्र मिलती है, किन्तु अन्य रचनाओं के संबंध में कुछ विशेष उल्लेख नहीं मिलता है।
चाणक्य के शिष्य कामंदक ने अपने 'नीतिसार' नामक ग्रंथ में लिखा है कि विष्णुगुप्त चाणक्य ने अपने बुद्धिबल से अर्थशास्त्र रूपी महोदधि को मथकर नीतिशास्त्र रूपी अमृत निकाला । चाणक्य का 'अर्थशास्त्र' संस्कृत में राजनीति विषय पर एक विलक्षण ग्रंथ है । इसके नीति के श्लोक तो घर घर प्रचलित हैं । पीछे से लोगों ने इनके नीति ग्रंथों से घटा बढाकर वृद्धचाणक्य, लघुचाणक्य, बोधिचाणक्य आदि कई नीतिग्रंथ संकलित कर लिए । चाणक्य सब विषयों के पंडित थे। 'विष्णुगुप्त सिद्धांत' नामक इनका एक ज्योतिष का ग्रंथ भी मिलता है । कहते हैं, आयुर्वेद पर भी इनका लिखा 'वैद्यजीवन' नाम का एक ग्रंथ है । न्याय भाष्यकार वात्स्यायनऔर चाणक्य को कोई कोई एक ही मानते हैं, पर यह भ्रम है जिसका मूल हेमचंद का यह श्लोक है:
- वात्स्यायन मल्लनागः, कौटिल्यश्चणकात्मजः ।
- द्रामिलः पक्षिलस्वामी विष्णु गुप्तोऽङ्गुलश्च सः ।।
यों धातुकौटिल्या और राजनीति नामक रचनाओं के साथ कौटिल्य का नाम जोड़ा गया है। कुछ विद्वानों का यह मानना है कि 'अर्थशास्त्र' के अलावा यदि कौटिल्य की अन्य रचनाओं का उल्लेख मिलता है, तो वह कौटिल्य की सूक्तियों और कथनों का संकलन हो सकता है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र[संपादित करें]
मुख्य लेख : अर्थशास्त्र ग्रन्थ
चाणक्य की राज्य की अवधारणा[संपादित करें]
राज्य की उत्पत्ति के संदर्भ में कौटिल्य ने स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा किन्तु कुछ संयोगवश की गई टिप्पणियों से स्पष्ट होता है कि वह राज्य के दैवी सिद्धांत के स्थान पर सामाजिक समझौते का पक्षधर था। हॉब्स, लॉक तथा रूसो की तरह राज्य की उत्पत्ति से पूर्व की प्राकृतिक दशा को वह अराजकता की संज्ञा देता है। राज्य की उत्पत्ति तब हुई जब मत्स्य न्याय के कानून से तंग आकर लोगों ने मनु को अपना राजा चुना तथा अपनी कृषि उपज का छठा भाग तथा स्वर्ण का दसवा भाग उसे देना स्वीकार किया। इसके बदले में राजा ने उनकी सुरक्षा तथा कल्याण का उत्तरदायित्व सम्भाला। कौटिल्य राजतंत्र का पक्षधर है।
राज्य के तत्त्व : सप्तांग सिद्धांत[संपादित करें]
कौटिल्य ने पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तकों द्वारा प्रतिपादित राज्य के चार आवश्यक तत्त्वों - भूमि, जनसंख्या, सरकार व सभ्प्रभुता का विवरण न देकर राज्य के सात तत्त्वों का विवेचन किया है। इस सम्बन्ध में वह राज्य की परिभाषा नहीं देता किन्तु पहले से चले आ रहे साप्तांग सिद्धांत का समर्थन करता है। कौटिल्य ने राज्य की तुलना मानव-शरीर से की है तथा उसके सावयव रूप को स्वीकार किया है। राज्य के सभी तत्त्व मानव शरीर के अंगो के समान परस्पर सम्बन्धित, अन्तनिर्भर तथा मिल-जुलकर कार्य करते हैं-
- (1) स्वामी (राजा) शीर्ष के तुल्य है। वह कुलीन, बुद्धिमान, साहसी, धैर्यवान, संयमी, दूरदर्शी तथा युद्ध-कला में निपुण होना चाहिए।
- (2) अमात्य (मंत्री) राज्य की आँखे हैं। इस शब्द का प्रयोग कौटिल्य ने मंत्रीगण, सचिव, प्रशासनिक व न्यायिक पदाधिकारियों के लिए भी किया है। वे अपने ही देश के जन्मजात नागरिक, उच्च कुल से सम्बंधित, चरित्रवान, योग्य, विभिन्न कलाओं में निपुण तथा स्वामीभक्त होने चाहिए।
- (3) जनपद (भूमि तथा प्रजा या जनसंख्या) राज्य की जंघाएँ अथवा पैर हैं, जिन पर राज्य का अस्तित्व टिका है। कौटिल्य ने उपजाऊ, प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण, पशुधन, नदियों, तालाबों तथा वन्यप्रदेश प्रधान भूमि को उपयुक्त बताया है।
जनसंख्या में कृषकों, उद्यमियों तथा आर्थिक उत्पादन में योगदान देने वाली प्रजा सम्मिलित है। प्रजा को स्वामिभक्त, परिश्रमी तथा राजा की आज्ञा का पालन करने वाला होना चाहिए।
- (4) दुर्ग (किला) राज्य की बाहें हैं, जिनका कार्य राज्य की रक्षा करना है। राजा को ऐसे किलों का निर्माण करवाना चाहिए, जो आक्रमक युद्ध हेतु तथा रक्षात्मक दृष्टिकोण से लाभकारी हों। कौटिल्य ने चार प्रकार के दुर्गों-औदिक (जल) दुर्ग, पर्वत (पहाड़ी) दुर्ग, वनदुर्ग (जंगली) तथा धन्वन (मरुस्थलीय) दुर्ग का वर्णन किया है।
- (5) कोष (राजकोष) राजा के मुख के समान है। कोष को राज्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना गया है, क्योंकि राज्य के संचालन तथा युद्ध के समय धन की आवश्यकता होती है। कोष इतना प्रचुर होना चाहिए कि किसी भी विपत्ति का सामना करने में सहायक हो। कोष में धन-वृद्धि हेतु कौटिल्य ने कई उपाय बताए हैं। संकटकाल में राजस्व प्राप्ति हेतु वह राजा को अनुचित तरीके अपनाने की भी सलाह देता है।
- (6) दण्ड (बल, डण्डा या सेना) राज्य का मस्तिष्क हैं। प्रजा तथा शत्रु पर नियंत्रण करने के लिए बल अथवा सेना अत्यधिक आवश्यक तत्त्व है। कौटिल्य ने सेना के छः प्रकार बताए हैं। जैसे-वंशानुगत सेना, वेतन पर नियुक्त या किराए के सैनिक, सैन्य निगमों के सैनिक, मित्र राज्य के सैनिक, शत्रु राज्य के सैनिक तथा आदिवासी सैनिक। संकटकाल में वैश्य तथा शूद्रों को भी सेना में भर्ती किया जा सकता है। सैनिकों को धैर्यवान, दक्ष, युद्ध-कुशल तथा राष्ट्रभक्त होना चाहिए। राजा को भी सैनिकों की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना चाहिए। कौटिल्य ने दण्डनीति के चार लक्ष्य बताए हैं- अप्राप्य वस्तु को प्राप्त करना, प्राप्त वस्तु की रक्षा करना, रक्षित वस्तु का संवर्धन करना तथा संवख्रधत वस्तु को उचित पात्रों में बाँटना।
- (7) सुहृद (मित्र) राज्य के कान हैं। राजा के मित्र शान्ति व युद्धकाल दोनों में ही उसकी सहायता करते हैं। इस सम्बन्ध में कौटिल्य सहज (आदर्श) तथा कृत्रिम मित्र में भेद करता है। सहज मित्र कृत्रिम मित्र से अधिक श्रेष्ठ होता है। जिस राजा के मित्र लोभी, कामी तथा कायर होते हैं, उसका विनाश अवश्यम्भावी हो जाता है।
इस प्रकार कौटिल्य का सप्तांग सिद्धांत राज्य के सावयव स्वरूप (Organic form) का निरूपण करते हुए सभी अंगो (तत्त्वों) की महत्त्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालता है। यद्यपि यह सिद्धांत राज्य की आधुनिक परिभाषा से मेल नहीं खाता, किन्तु कौटिल्य के राज्य में आधुनिक राज्य के चारों तत्त्व विद्यमान हैं। जनपद भूमि व जनसंख्या है, अमात्य सरकार का भाव है तथा स्वामी (राजा) सम्प्रभुत्ता का प्रतीक है। कोष का महत्त्व राजप्रबन्ध, विकास व संवर्धन में है तथा सेना आन्तरिक शान्ति व्यवस्था तथा बाहरी सुरक्षा के लिए आवश्यक है। विदेशी मामलों में मित्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है, किन्तु दुर्ग का स्थान आधुनिक युग में सुरक्षा-प्रतिरक्षा के अन्य उपकरणों ने ले लिया है।
राज्य का कार्य[संपादित करें]
प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन का अनुकरण करते हुए कौटिल्य ने भी राजतंत्र की संकल्पना को अपने चिंतन का केन्द्र बनाया है। वह लौकिक मामलों में राजा की शक्ति को सर्वोपरि मानता है, परन्तु कर्त्तव्यों के मामलों में वह स्वयं धर्म में बँधा है। वह धर्म का व्याख्याता नहीं, बल्कि रक्षक है। कौटिल्य ने राज्य को अपने आप में साध्य मानते हुए सामाजिक जीवन में उसे सर्वोच्च स्थान दिया है। राज्य का हित सर्वोपरि है जिसके लिए कई बार वह नैतिकता के सिद्धांतो को भी परे रख देता है।
कौटिल्य के अनुसार राज्य का उद्देश्य केवल शान्ति-व्यवस्था तथा सुरक्षा स्थापित करना नहीं, वरन् व्यक्ति के सर्वोच्च विकास में योगदान देना है। कौटिल्य के अनुसार राज्य के कार्य हैं-
सुरक्षा सम्बन्धी कार्य[संपादित करें]
वाह्य शत्रुओं तथा आक्रमणकारियों से राज्य को सुरक्षित रखना, आन्तरिक व्यवस्था न्याय की रक्षा तथा दैवी (प्राकृतिक आपदाओं) विपत्तियों- बाढ़, भूकंप, दुर्भिक्ष, आग, महामारी, घातक जन्तुओं से प्रजा की रक्षा राजा के कार्य हैं।
स्वधर्म का पालन कराना[संपादित करें]
स्वधर्म के अन्तर्गत वर्णाश्रम धर्म (वर्ण तथा आश्रम पद्धति) पर बल दिया गया है। यद्यपि कौटिल्य मनु की तरह धर्म को सर्वोपरि मानकर राज्य को धर्म के अधीन नहीं करता, किन्तु प्रजा द्वारा धर्म का पालन न किए जाने पर राजा धर्म का संरक्षण करता है।
सामाजिक दायित्व[संपादित करें]
राजा का कर्त्तव्य सर्वसाधारण के लिए सामाजिक न्याय की स्थापना करना है। सामाजिक व्यवस्था का समुचित संचालन तभी संम्भव है, जबकि पिता-पुत्र, पति-पत्नी, गुरु-शिष्य आदि अपने दायित्वों का निर्वाह करें। विवाह-विच्छेद की स्थिति में वह स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों पर बल देता है। स्त्रीवध तथा ब्राह्मण-हत्या को गम्भीर अपराध माना गया है।
जनकल्याण के कार्य[संपादित करें]
कौटिल्य के राज्य का कार्य-क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। वह राज्य को मानव के बहुमुखी विकास का दायित्व सौंपकर उसे आधुनिक युग का कल्याणकारी राज्य बना देता है। उसने राज्य को अनेक कार्य सौंपे हैं। जैसे- बाँध, तालाब व सिंचाई के अन्य साधनों का निर्माण, खानों का विकास, बंजर भूमि की जुताई, पशुपालन, वन्यविकास आदि। इनके अलावा सार्वजनिक मनोरंजन राज्य के नियंत्रण में था। अनाथों निर्धनों, अपंगो की सहायता, स्त्री सम्मान की रक्षा, पुनख्रववाह की व्यवस्था आदि भी राज्य के दायित्व थे।
इस प्रकार कौटिल्य का राज्य सर्वव्यापक राज्य है। जन-कल्याण तथा अच्छे प्रशासन की स्थापना उसका लक्ष्य है, जिसमें धर्म व नैतिकता का प्रयोग एक साधन के रूप में किया जाता है। कौटिल्य का कहना है,
- ‘‘प्रजा की प्रसन्नता में ही राजा की प्रसन्नता है। प्रजा के लिए जो कुछ भी लाभकारी है, उसमें उसका अपना भी लाभ है।’’
एक अन्य स्थान पर उसने लिखा है।
- ‘‘बल ही सत्ता है, अधिकार है। इन साधनों के द्वारा साध्य है प्रसन्नता।’’
इस सम्बन्ध में सैलेटोरे का कथन है, ‘‘जिस राज्य के पास सत्ता तथा अधिकार है, उसका एकमात्र उद्देश्य अपनी प्रजा की प्रसन्नता में वृद्धि करना है। इस प्रकार कौटिल्य ने एक कल्याणकारी राज्य के कार्यों को उचित रूप में निर्देषित किया है।’’
कूटनीति तथा राज्यशिल्प[संपादित करें]
कौटिल्य ने न केवल राज्य के आन्तरिक कार्य, बल्कि वाह्य कार्यों की भी विस्तार से चर्चा की है। इस सम्बन्ध में वह विदेश नीति, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों तथा युद्ध व शान्ति के नियमों का विवेचन करता है। कूटनीति के सम्बन्धों का विश्लेषण करने हेतु उसने मण्डल सिद्धांत प्रतिपादित किया है-
मण्डल सिद्धांत[संपादित करें]
कौटिल्य ने अपने मण्डल सिद्धांत में विभिन्न राज्यों द्वारा दूसरे राज्यों के प्रति अपनाई नीति का वर्णन किया। प्राचीन काल में भारत में अनेक छोटे-छोटे राज्यों का अस्तित्व था। शक्तिशाली राजा युद्ध द्वारा अपने साम्राज्य का विस्तार करते थे। राज्य कई बार सुरक्षा की दृष्टि से अन्य राज्यों में समझौता भी करते थे। कौटिल्य के अनुसार युद्ध व विजय द्वारा अपने साम्राज्य का विस्तार करने वाले राजा को अपने शत्रुओं की अपेक्षाकृत मित्रों की संख्या बढ़ानी चाहिए, ताकि शत्रुओं पर नियंत्रण रखा जा सके। दूसरी ओर निर्बल राज्यों को शक्तिशाली पड़ोसी राज्यों से सतर्क रहना चाहिए। उन्हें समान स्तर वाले राज्यों के साथ मिलकर शक्तिशाली राज्यों की विस्तार-नीति से बचने हेतु एक गुट या ‘मंडल’ बनाना चाहिए। कौटिल्य का मंडल सिद्धांत भौगोलिक आधार पर यह दर्शाता है कि किस प्रकार विजय की इच्छा रखने वाले राज्य के पड़ोसी देश (राज्य) उसके मित्र या शत्रु हो सकते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार मंडल के केन्द्र में एक ऐसा राजा होता है, जो अन्य राज्यों को जीतने का इच्छुक है, इसे ‘‘विजीगीषु’’ कहा जाता है। ‘‘विजीगीषु’’ के मार्ग में आने वाला सबसे पहला राज्य ‘‘अरि’’ (शत्रु) तथा शत्रु से लगा हुआ राज्य ‘‘शत्रु का शत्रु’’ होता है, अतः वह विजीगीषु का मित्र होता है। कौटिल्य ने ‘‘मध्यम’’ व ‘‘उदासीन’’ राज्यों का भी वर्णन किया है, जो सामर्थ्य होते हुए भी रणनीति में भाग नहीं लेते।
कौटिल्य का यह सिद्धांत यथार्थवाद पर आधारित है, जो युद्धों को अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की वास्तविकता मानकर संधि व समझौते द्वारा शक्ति-सन्तुलन बनाने पर बल देता है।
छः सूत्रीय विदेश नीति[संपादित करें]
कौटिल्य ने विदेश सम्बन्धों के संचालन हेतु छः प्रकार की नीतियों का विवरण दिया है-
- (1) संधि शान्ति बनाए रखने हेतु समतुल्य या अधिक शक्तिशाली राजा के साथ संधि की जा सकती है। आत्मरक्षा की दृष्टि से शत्रु से भी संधि की जा सकती है। किन्तु इसका लक्ष्य शत्रु को कालान्तर निर्बल बनाना है।
- (2) विग्रह या शत्रु के विरुद्ध युद्ध का निर्माण।
- (3) यान या युद्ध घोषित किए बिना आक्रमण की तैयारी,
- (4) आसन या तटस्थता की नीति,
- (5) संश्रय अर्थात् आत्मरक्षा की दृष्टि से राजा द्वारा अन्य राजा की शरण में जाना,
- (6) द्वैधीभाव अर्थात् एक राजा से शान्ति की संधि करके अन्य के साथ युद्ध करने की नीति।
कौटिल्य के अनुसार राजा द्वारा इन नीतियों का प्रयोग राज्य के कल्याण की दृष्टि से ही किया जाना चाहिए।
कूटनीति आचरण के चार सिद्धांत[संपादित करें]
कौटिल्य ने राज्य की विदेश नीति के संदर्भ में कूटनीति के चार सिद्धांतों साम (समझाना, बुझाना), दाम (धन देकर सन्तुष्ट करना), दण्ड (बलप्रयोग, युद्ध) तथा भेद (फूट डालना) का वर्णन किया। कौटिल्य के अनुसार प्रथम दो सिद्धांतों का प्रयोग निर्बल राजाओं द्वारा तथा अंतिम दो सिद्धांतों का प्रयोग सबल राजाओं द्वारा किया जाना चाहिए, किन्तु उसका यह भी मत है कि साम दाम से, दाम भेद से और भेद दण्ड से श्रेयस्कर है। दण्ड (युद्ध) का प्रयोग अन्तिम उपाय के रूप में किया जाए, क्योंकि इससे स्वयं की भी क्षति होती है।
गुप्तचर व्यवस्था[संपादित करें]
कौटिल्य ने गुप्तचरों के प्रकारों व कार्यों का विस्तार से वर्णन किया है। गुप्तचर विद्यार्थी गृहपति, तपस्वी, व्यापारी तथा विष -कन्याओं के रूप में हो सकते थे। राजदूत भी गुप्तचर की भूमिका निभाते थे। इनका कार्य देश-विदेश की गुप्त सूचनाएँ राजा तक पहुँचाना होता था। ये जनमत की स्थिति का आंकलन करने, विद्रोहियों पर नियंत्रण रखने तथा शत्रु राज्य को नष्ट करने में योगदान देते थे। कौटिल्य ने गुप्तचरों को राजा द्वारा धन व मान देकर सन्तुष्ट रखने का सुझाव दिया है।
चाणक्य और मकियावेली[संपादित करें]
यह सत्य है कि कौटिल्य ने राष्ट्र की रक्षा के लिए गुप्त प्रणिधियों के एक विशाल संगठन का वर्णन किया है। शत्रुनाश के लिए विषकन्या, गणिका, औपनिषदिक प्रयोग, अभिचार मंत्र आदि अनैतिक एवं अनुचित उपायों का विधान है और इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए महान धन-व्यय तथा धन-क्षय को भी (सुमहताऽपि क्षयव्ययेन शत्रुविनाशोऽभ्युपगन्तव्य:) राष्ट्र-नीति के अनुकूल घोषित किया है।
‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ में ऐसी चर्चाओं को देखकर ही मुद्राराक्षसकार कवि विशाखादत्त चाणक्य को कुटिलमति (कौटिल्य: कुटिलमतिः) कहा है और बाणभट्ट ने ‘कौटिल्य अर्थशास्त्र’ को ‘निर्गुण’ तथा ‘अतिनृशंसप्रायोपदेशम्’ (निर्दयता तथा नृशंसता का उपदेश देने वाला) कहकर निन्दित बतलाया है। 'मञ्जुश्री मूलकल्प' नाम की एक नवीन उपलब्ध ऐतिहासिक कृति में कौटिल्य को ‘दुर्मति’, क्रोधन और ‘पापक’ पुकारकर गर्हा का पात्र प्रदर्शित किया गया है।
प्राच्यविद्या के विशेषज्ञ अनेक आधुनिक पाश्चात्य विद्वानों ने भी उपर्युक्त अनैतिक व्यवस्थाओं को देखकर कौटिल्य की तुलना यूरोप के प्रसिद्ध लेखक और राजनीतिज्ञ मेकियावली से की है, जिसने अपनी पुस्तक ‘द प्रिन्स’ में राजा को लक्ष्य-प्राप्ति के लिए उचित अनुचित सभी साधनों का आश्रय लेने का उपदेश दिया है। विण्टरनिट्ज आदि पाश्चात्य विद्वान् कौटिल्य तथा मेकियावली में निम्नलिखित समानताएं प्रदर्शित करते हैं:
- (क) मेकियावली और कौटिल्य दोनों राष्ट्र को ही सब कुछ समझते हैं। वे राष्ट्र को अपने में ही उद्देश्य मानते हैं।
- (ख) कौटिल्य-नीति का मुख्य आधार है, ‘आत्मोदय: परग्लानि;’ अर्थात् दूसरों की हानि पर अपना अभ्युदय करना। मेकियावली ने भी दूसरे देशों की हानि पर अपने देश की अभिवृद्धि करने का पक्ष-पोषण किया है। दोनों एक समान स्वीकार करते हैं कि इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए कितने भी धन तथा जन के व्यय से शत्रु का विनाश अवश्य करना चाहिए।
- (ग) अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए किसी भी साधन, नैतिक या अनैतिक, का आश्रय लेना अनुचित नहीं है। मेकियावली और कौटिल्य दोनों का मत है कि साध्य को सिद्ध करना ही राजा का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। साधनों के औचित्य या अनौचित्य की उसे चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
- (घ) दोनों युद्ध को राष्ट्र-नीति का आवश्यक अंग मानते हैं। दोनों की सम्मति में प्रत्येक राष्ट्र को युद्ध के लिए उद्यत रहना चाहिए, क्योंकि इसी के द्वारा देश की सीमा तथा प्रभाव का विस्तार हो सकता है।
- (ङ) अपनी प्रजा में आतंक स्थापित करके दृढ़ता तथा निर्दयता से उस पर शासन करना दोनों एक समान प्रतिपादित करते हैं। दोनों एक विशाल सुसंगठित गुप्तचर विभाग की स्थापना का समर्थन करते हैं, जो प्रजा के प्रत्येक पार्श्व में प्रवेश करके राजा के प्रति उसकी भक्ति की परीक्षा करे और शत्रु से सहानुभूति रखने वाले लोगों को गुप्त उपायों से नष्ट करने का यत्न करे।
अत: कौटिल्य तथा मेकियावली में ऐसी सदृशता दिखाना युक्तिसंगत नहीं। निस्सन्देह कौटिल्य भी मेकियावली के समान यथार्थवादी था और केवल आदर्शवाद का अनुयायी न था। परन्तु यह कहना कि कौटिल्य ने धर्म या नैतिकता को सर्वथा तिलांञ्जलि दे दी थी, सत्यता के विपरीत होगा। कौटिल्य ने ‘अर्थशास्त्र’ के प्रथम अधिकरण में ही स्थापना की है;
- तस्मात् स्वधर्म भूतानां राजा न व्यभिचारयेत्।
- स्वधर्म सन्दधानो हि, प्रेत्य चेह न नन्दति।। (1/3)
अर्थात्- राजा प्रजा को अपने धर्म से च्युत न होने दे। राजा भी अपने धर्म का आचरण करे। जो राजा अपने धर्म का इस भांति आचरण करता है, वह इस लोक और परलोक में सुखी रहता है।
इसी प्रथम अधिकरण में ही राजा द्वारा अमर्यादाओं को व्यवस्थित करने पर भी बल दिया गया है और वर्ण तथा आश्रम-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए आदेश दिया गया है। यहां पर त्रयी तथा वैदिक अनुष्ठान को प्रजा के संरक्षण का मूल आधार बतलाया गया है। कौटिल्य ने स्थान-स्थान पर राजा को वृद्धों की संगत करने वाला, विद्या से विनम्र, जितेन्द्रिय और काम-क्रोध आदि शत्रु-षड्वर्ग का दमन करने वाला कहा है। ऐसा राजा अधार्मिक अथवा अत्याचारी बनकर किस प्रकार प्रजा-पीड़न कर सकता है ? इसके विपरीत राजा को प्रजा के लिए पितृ-तुल्य कहा गया है, जो अपनी प्रजा का पालन-पोषण, संवर्धन, संरक्षण, भरण, शिक्षण इत्यादि वैसा ही करता है जैसा वह अपनी सन्तान का करता है।
यह ठीक है कि कौटिल्य ने शत्रुनाश के लिए अनैतिक उपायों के करने का भी उपदेश दिया है। परन्तु इस सम्बन्ध में अर्थशास्त्र के निम्न वचन को नहीं भूलना चाहिए:
- एवं दूष्येषु अधार्मिकेषु वर्तेत, न इतरेषु। (5/2)
अर्थात्- इन कूटनीति के उपायों का व्यवहार केवल अधार्मिक एवं दुष्ट लोगों के साथ ही करे, धार्मिक लोगों के साथ नहीं। (धर्मयुद्ध में भी अधार्मिक व्यवहार सर्वथा वर्जित था। केवल कूट-युद्ध में अधार्मिक शत्रु को नष्ट करने के लिए इसका प्रयोग किया जा सकता था।)
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